फरीदाबाद। लोभ, क्रोध, ईष्र्या जिंदगी में तनाव पैदा करते हैं, तनाव जिंदगी के साथ दूसरा चिपका हुआ शब्द है, क्योंंकि इस भौतिक युग में हर तरफ व्यक्ति नंबर वन बनने की होड़ में लगा हुआ है इस कारण उसका मन और मस्तिष्क दोनों चिंतित रहते हैं। इससे ईष्र्या को बल मिलता है। अज्ञान, क्रोध, लोभ की अग्रि वह अग्नि है जो मनुष्य को स्वयं जलाती है। यह बात एनआईटी स्थित दशहरा ग्राउंड में ऋषि चैतन्य विजन फरीदाबाद द्वारा आयोजित चार दिवसीय ज्ञान, भक्ति, योग की अमृतवर्षा समागम के तीसरे दिन परमपूज्य आनंदमूर्ति गुरूमां ने विशाल समागम को संबोधित करते हुए कही। समागम समारोह रविवार को भी जारी रहेगा।
परमपूज्य आनंदमूर्ति गुरूमां ने कहा कि यदि जीवन में सुख की प्राप्ति चाहते हैं तो हमें सोच को बड़ा करना होगा और लोगों की मदद के लिए दोनों हाथ से सेवा करनी होगी। इससे प्रभु की भक्ति का आनंद प्राप्त होता है और परमात्मा भी ऐसे लोगों से खुश होकर उनके जीवन में अपार खुशियां भर देता है। मन को नियंत्रण में करने वाले व्यक्ति हमेशा जीवन में सत्य की खोज करने में सफल हो पाते हैं। उनके परिवार और जीवन में हमेशा सुख और शांति का वास होता है इसलिए मन का इंद्रियों पर नियंत्रण अति आवश्यक है। यही हमें धर्म सीखाता है। ऋषि मुनि कहते हैं कि हमेशा लोगों की सेवा और जिह्वा से विनम्र बोल तथा पैरों से धर्म स्थलों तक गमन तथा संतों के समागम में उनके वचनो का श्रवण और जीवन में पालन करने से सभी कष्ट दूर होते हैं।
परमपूज्य आनंदमूर्ति गुरूमां ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं कि अगर तुम अपने मन को स्थिर करते हुए मेरे में लगाने का प्रयास करते हो तो मैं आपके लिए सर्व स्थान खड़ा मिलूंगा। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार हमें भौतिक सुख प्राप्ति की इच्छा होती है उसी प्रकार हमें ईश्वर प्राप्ति की इच्छा भी होनी चाहिए और ईश्वर की प्राप्ति संतों के सत्संग और समागम के द्वारा ही संभव है। योग पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि योग करने से मन का एकाग्रता मिलती है और शरीर निरोगी रहता है। मन शांत और मस्तिष्क तेज होता है।
